Est. 1961

प्रधानाचार्य की कलम से

  • शिक्षा का उद्देश्य है मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों का प्रकटीकरण। केवल अक्षर ज्ञान कराना ही मात्र शिक्षा नहीं है। मैं कौन हूँ ? मेरा राष्ट्र क्या है ? मेरा अपने राष्ट्र और समाज के प्रति कर्तव्य क्या है ? यह अनुभूति कराने आज अत्यावश्यक है। आज का भौतिकवादी वातावरण बालक को स्व. केन्द्रित बना रहा है। ऐसे में विद्यालयों और आचार्यो की भूमिका अधिक प्रभावी हो जाती है वे बालक में "मैं" के स्थान पर हम" का विकास करें। विद्या मन्दिर की शिक्षा इस "मैं" से "हम" के विकास का ही एक प्रयास है।

    (राजेंद्र गुप्ता)